(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.88. अध्यायः 088
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
पूरुवंशकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच। 1-88-0x(565)(3844)
पुत्रं ययातेः प्रबूहि पूरुं धर्मभृतां वरम्।
आनुपूर्व्येण ये चान्ये पूरोर्वंशविवर्धनाः॥ 1-88-1(3845)
विस्तरेण पुनर्ब्रूहि दौष्यन्तेर्जनमेजयात्।
संबभूव यथा राजा भरतो द्विजसत्तम॥ 1-88-2(3846)
वैशम्पायन उवाच। 1-88-3x(566)
पूरुर्नृपतिशार्दूलो यथैवास्य पिता नृप।
धर्मनित्यः स्थितो राज्ये शक्रतुल्यपराक्रमः॥ 1-88-3(3847)
प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः।
पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत्ततः॥ 1-88-4(3848)
मनस्युरभवत्तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः॥ 1-88-5(3849)
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः।
मनस्योरभवन्पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः॥ 1-88-6(3850)
अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः।
रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः॥ 1-88-7(3851)
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः।
सर्वे सर्वास्त्रविद्वासः सर्वे धर्मपरायणाः॥ 1-88-8(3852)
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान्।
स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः॥ 1-88-9(3853)
तेजेयुर्बलावान्धीमान्सत्येयुश्चन्द्रविक्रमः।
धर्मेयुः सन्नतेयुश्च दशमो देवविक्रमः॥ 1-88-10(3854)
अनाधृष्टिरभूत्तेषां विद्वान्भुवि तथैकराट्।
ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः॥ 1-88-11(3855)
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद्राजसूयाश्वमेधकृत्।
मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः॥ 1-88-12(3856)
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः।
तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः॥ 1-88-13(3857)
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन्।
आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुंधराम्॥ 1-88-14(3858)
ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान्।
सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः॥ 1-88-15(3859)
रथन्तर्यां सुतान्पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः।
ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन्नृपान्॥ 1-88-16(3860)
दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च।
तेषां श्रेष्ठोऽभवद्राजा दुष्यन्तो दुर्जयो युधि॥ 1-88-17(3861)
दुष्यन्ताल्लक्षणायां तु जज्ञे वै जनमेजयः।
शकुन्तलायां भरतो दौष्यन्तिरभवत्सुतः॥ 1-88-18(3862)
तस्माद्भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः॥ ॥ 1-88-19(3863)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टाशीतितमोऽध्यायः॥ 88 ॥


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